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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 2nd Jan 2018

    134- मैं, शक्तिमान !

    नया साल भी शुरु हो गया जी। ज़िंदगी की रफ्तार और महानगरों में लगने वाले जाम इसी तरह चलते रहेंगे, क्योंकि ऐसा लगता है कि जितने फ्लाई-ओवर बनते जा रहे हैं, उतना ही ‘जाम’ भी बढ़ता जाता है। हमारे देश के साथ एक और स्थाई समस्या है, हमारे देश से ही अलग होकर आतंकवाद की…

  • 1st Jan 2018

    133. लो जी, आ गया नया साल-2018.

    आखिर आ ही गया नया साल! नववर्ष का शिशु, धरती पर अपने नन्हे पांव रख चुका है, इसकी अगवानी कीजिए। आज ज्ञान बघारने का समय नहीं है, यह सोचें कि क्या है जो पिछले वर्ष चाहकर भी नहीं हासिल कर पाए, और इरादा बनाएं वह उपलब्धि इस वर्ष प्राप्त करने की! किसी कवि की पंक्तियां…

  • 31st Dec 2017

    132. मुबारक़ हो नया साल!

    कुछ दिन से अपनी पुरानी कुछ कविताएं शेयर कर रहा हूँ, ऐसी कविताएं जिन्हें पहले कहीं सुनाया, दिखाया या छपवाया नहीं। ये स्टॉक अभी खत्म नहीं हुआ, आगे भी जारी रहेगा, लेकिन इस बीच ये नया साल भी तो आ गया न! तो आज साबिर दत्त जी की ये रचना, जिसे जगजीत सिंह जी ने…

  • 30th Dec 2017

    131. जवां रहो!

    अब जब पुरानी कविताएं शेयर करने का सिलसिला चल निकला है तो लीजिए, मेरी एक और पुरानी कविता प्रस्तुत है- सपनों के झूले में झूलने का नाम है- बचपन, तब तक-जब तक कि इन सपनों की पैमाइश जमीन के टुकड़ों, इमारत की लागत और बैंक खाते की सेहत से न आंकी जाए। जवान होने का…

  • 29th Dec 2017

    130. बचपन

    मेरी कुछ पुरानी कविताओं को शेयर करने के क्रम में, प्रस्तुत है आज की कविता- बचपन बचपन के बारे में, आपके मन में भी कुछ सपनीले खयालात होंगे, है भी ठीक, अपने आदर्श रूप में- बचपन एक सुनहरा सपना है, जो बीत जाने के बाद, बार-बार याद आता है। कोशिश रहती है हमारी, कि हमारे…

  • 28th Dec 2017

    129. मन के सुर राग में बंधें!

    पुरानी कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना यानी ‘पास्ट इंपर्फेक्ट’ कविताओं में से, एक कविता आज प्रस्तुत है- मुझमें तुम गीत बन रहो मुझमें तुम गीत बन रहो, मन के सुर राग में बंधें। वासंती सारे सपने पर यथार्थ तेज धूप है, मन की ऊंची उड़ान है नियति किंतु अति कुरूप है, साथ-साथ…

  • 27th Dec 2017

    128. पेड़!

    किसी ज़माने में कविताएं लिखने का बहुत चाव था। उस समय जो कविताएं किसी हद तक ‘परफेक्ट’ लगती थीं उनको मित्रों के बीच, गोष्ठियों में पढ़ देता था। बहुत सी पांडुलिपियां ऐसी होती थीं जिनको लेकर तसल्ली नहीं होती थी। ऐसी ही कुछ कागज़ पर सुरक्षित कविताएं, जिनको मैंने उस समय फाइनल नहीं माना और…

  • 26th Dec 2017

    127. बुझी हुई बाती सुलगाएं!

    अब हम फिर से एक वर्ष के आखिरी मुहाने पर हैं, जैसे कोई किसी किताब के पन्ने पलटता है, लगभग 300-350 शब्द हो जाने के बाद, वैसे ही 365 दिन के बाद, हमारे जीवन की किताब में एक और पन्ना पलट जाता है, सफर में एक और स्टेशन पीछे छूट जाता है। अभी क्रिसमस का…

  • 25th Dec 2017

    126. कहती टूटी दीवट, सुन री उखड़ी देहरी!

    आज एक खबर कहीं पढ़ी कि उत्तराखंड के किसी गांव में केवल बूढ़े लोग रह गए हैं, विशेष रूप से महिलाएं, जवान लोग रोज़गार के लिए शहरों को पलायन कर गए हैं। वैसे यह खबर नहीं, प्रक्रिया है, जो न जाने कब से चल रही है, गांव से शहरों की ओर तथा नगरों, महानगरों से…

  • 24th Dec 2017

    125. जैसी अब है तेरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी!

    आज बहादुर शाह ज़फर जी की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। अभिव्यक्ति की दुनिया में हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं। कुछ लोग सामान्य जीवन में ही स्वयं को पर्याप्त रूप से अभिव्यक्त करते रहते हैं। कुछ उसके अलावा कला के विभिन्न उपादानों का सहारा लेकर- कविता, पेंटिंग, अभिनय, नाटक-फिल्म आदि…

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