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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 11th Jan 2018

    143. मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता

    आज एक बार फिर से निदा फाज़ली साहब की एक गज़ल शेयर करने का मन हो रहा है। गज़ल में अपनी बात कहने का सलीका, और जिस बारीकी से फीलिंग्स को कविता में उकेरा जाता है, यह उनकी पहचान रही है। हम सभी इस दुनिया में जी रहे हैं, किसी के पास पैसा है, रुतबा…

  • 11th Jan 2018

    142. देखिये आपने फिर प्यार से देखा मुझको!

    आज राज कपूर जी की  फिल्म – ‘फिर सुबह होगी’ का एक युगल गीत याद आ रहा है, जिसे साहिर लुधियानवी जी ने लिखा है, खैय्याम जी ने इसका संगीत तैयार किया है और इस गीत को मुकेश जी और आशा भौंसले जी ने गाया है। गीत का विषय, जैसे कि आम तौर पर होता…

  • 10th Jan 2018

    141. दिल से दिल की बात कही और रो लिए।

    आज लता मंगेशकर जी की गाई एक गज़ल याद आ रही है, जिसे राजेंदर कृष्ण जी ने लिखा है और इसके लिए संगीत दिया है, मदन मोहन जी ने। बड़े सुंदर बोल हैं, दिल को छूने वाले जिनको लता जी की आवाज और मदन मोहन जी के संगीत ने बहुत प्रभावशाली बना दिया है। कुल…

  • 9th Jan 2018

    140. एक छलिया आस के पीछे, दौड़े तो यहाँ तक आए!

    चलो एक ख्वाब बुनते हैं, नई एक राह चुनते हैं। अंधेरा है सफर तो क्या, कठिन है रहगुज़र तो क्या, हमारा फैसला तो है, दिलों में हौसला तो है। बहुत से ख्वाब हैं, जिनको हक़ीकत में बदलना है, अभी एक साथ में है कल इसे साकार करना है, निरंतर यह सफर ख्वाबों का, इनके साथ…

  • 8th Jan 2018

    139. भाषा की डुगडुगी बजाते हैं!

    कुछ ऐसी पुरानी कविताएं, जो पहले कभी शेयर नहीं की थीं, वे अचानक मिल गईं और मैंने शेयर कर लीं, आज इसकी आखिरी कड़ी है। अपनी बहुत सी रचनाएं मैं शुरू के ब्लॉग्स में शेयर कर चुका हूँ, कोई इधर-उधर बची होगी तो फिर शेयर कर लूंगा। आज की रचना हल्की-फुल्की है, गज़ल के छंद…

  • 7th Jan 2018

    138. अजनबी हवाएं, मौसम आदमखोर!

    पुरानी कविताओं का यह खजाना भी अब निपटने को है, पुरानी जमा-पूंजी के बल पर कोई कब तक तमाशा जारी रखेगा। इस बहाने ऐसी पुरानी रचनाएं डिजिटल फॉर्म में सुरक्षित हो गईं, जो ऐसे ही कहीं कागजों में लिखी पड़ी थीं। ये लीजिए प्रस्तुत है आज का गीत- गीतों के सुमन जहाँ महके थे, वह…

  • 6th Jan 2018

    137. लगता है लोकतंत्र इसी तरह आता है!

    पिछले कुछ दिनों से अपने कुछ पुराने गीत, कविताएं आपके साथ शेयर कर रहा हूँ, जो 1988 से 2000 के बीच लिखे गए थे, लेकिन मैंने किसी मंच से शेयर नहीं किए थे, बस कहीं कागज़ों में अंकित पड़े रह गए थे। एक बात और कि जिस समय इनको लिखकर रखा था, तब इनमें कहीं…

  • 5th Jan 2018

    137. गीत उगने दो!

    आज का गीत छोटा सा है। जैसा है आपके सामने प्रस्तुत है- मौन यूं कवि मत रहो, अब गीत उगने दो। अनुभव की दुनिया के अनगिनत पड़ाव, आसपास से गुज़र गए, झोली में भरे कभी पर फिर अनजाने में, सभी पत्र-पुष्प झर गए, करके निर्बंध, पिपासे मानव-मन को- अनुभव-संवेदन दाना चुगने दो। खुद से खुद…

  • 4th Jan 2018

    136. सिरजन की प्यास मेरे मन में उतार दे!

    एक गीत और आज  शेयर कर रहा हूँ, यह मां शारदे से प्रार्थना के रूप में है। ये गीत उन दिनों लिखे गए थे जब मैं दिल्ली छोड़ चुका था, दिल्ली में मेरे पास गोष्ठियों आदि में नई रचनाएं सुनने और शेयर करने की सुविधा उपलब्ध थी, जबकि बाद में जहाँ था, वहाँ ऐसी कविताएं…

  • 3rd Jan 2018

    135. गीतों में कहनी थीं तुमसे कुछ बातें!

    चलिए अब फिर से, जो काम बीच में छोड़ दिया था अपनी अधबुनी, अधखुली कवित्ताओं को शेयर करने का, वो काम फिर से शुरू करता हूँ। आज की कविता गीत के रूप में है-   गीतों में कहनी थीं, तुमसे कुछ बातें आओ कुछ समय यहीं साथ-साथ काटें। अपनी तुतली ज़ुबान गीतमयी मुद्दत से बंद…

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