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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 19th Mar 2018

    39. पर दिलों पर हुक़ूमत हमारी रही!

    चलिए आज फिर से यादों की पुरानी संदूकची खोलते हैं, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! लगभग ढाई वर्ष के लखनऊ प्रवास और सात वर्ष के ऊंचाहार प्रवास की कुछ छिटपुट घटनाएं याद करने का प्रयास करता हूँ। एक घटना जो याद आ रही है, वह है लखनऊ के पिकप प्रेक्षागृह में आयोजित कवि…

  • 18th Mar 2018

    38. यह पूजन अपनी संस्कृति का, ये अर्चन अपनी भाषा का।

    पुरानी स्मृतियां खंगालने के क्रम में, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! अभी तक मैं वर्षों के हिसाब से बात कर रहा था, जो घटना पहली हुई वह पहले और जो बाद में हुई वह बाद में। पिछले ब्लॉग में, मैं काफी पीछे चला गया था। वैसे मैंने लखनऊ पहुंचने तक की बात की…

  • 17th Mar 2018

    169. वहीँ खाक़ अपनी उड़ाने चला हूँ।!

    चंद तस्वीर-ए-बुतां , चंद हसीनों के खुतूत ! बाद मरने के मेरे घर से ये सामान निकला !! आज चचा ग़ालिब का ये शेर याद आया, तो ये खयाल आया कि कैसे-कैसे लोग होते थे, बल्कि आज भी होते हैं, जो इतने भर से गुज़ारा कर लेते हैं। लेकिन अपना साज़-ओ-सामान समेटते-समेटते हमारा ध्यान उस…

  • 16th Mar 2018

    168. जाने कब समंदर मांगने आ जाए!

    आज स्व. रामावतार त्यागी जी का एक गीत याद आ रहा है, जो स्वाभिमान की सशक्त अभिव्यक्ति है, यह भाव है इसमें कि मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए, अपितु अपने स्वाभिमान, पुरुषार्थ और आस्था के साथ आगे बढ़ना चाहिए। एक भी आँसू न कर बेकार जाने कब समंदर मांगने आ…

  • 15th Mar 2018

    37. हम सदा जिए झुककर सामने हवाओं के!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! मेरे न चाहते हुए भी, एनटीपीसी में आने के बाद की मेरी कहानी मुख्य रूप से कुछ नकारात्मक चरित्रों पर केंद्रित होकर रह गई है। वैसे मेरे जीवन में इन व्यक्तियों का बिल्कुल महत्व नहीं है। मैं बस कुछ प्रवृत्तियों को रेखांकित…

  • 14th Mar 2018

    167. मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा!

    आज दुष्यंत कुमार जी की एक गज़ल के बहाने बात करते हैं। लगभग एक वर्ष हो गया मुझे ब्लॉग लिखते हुए, जब शुरू किया था तब मूलतः फेसबुक, ट्विटर पर निर्भर था, अब ब्लॉग लिखने वाले समुदाय के बहुत से लोग जुड़ गए हैं, ये देखकर अच्छा लगता है। कभी-कभी यह भी देखता हूँ कि…

  • 13th Mar 2018

    166. ब्रह्मराक्षस

    मुक्तिबोध जी की एक बहुत लंबी कविता है-‘ ब्रह्मराक्षस’, पहली बार बहुत पहले पढ़ी थी, जब कविताएं पढ़ा करता था। बहुत दिनों से यह कविता मन में कौंध रही थी, आज सोचा कि इसका कुछ हिस्सा आपके साथ शेयर ही कर लूं। मैं इसका संपूर्ण अर्थ समझने का दावा नहीं करता, लेकिन एक बात तो…

  • 12th Mar 2018

    165. सुन मेरे साथी रे!

    आज सचिन दा की याद आ रही है। संगीत की दुनिया में सचिन दा, अर्थात सचिन देव बर्मन जी की अलग ही पहचान थी, बाद में उनके बेटे यानि राहुल देव बर्मन जी ने अपार सफलता प्राप्त की, वास्तव में सचिन दा और आरडी (राहुल देव बर्मन) संगीत के क्षेत्र में दो अलग ज़मानों का…

  • 11th Mar 2018

    36. थोड़ी बहुत तो ज़ेहन में नाराज़गी रहे!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! पश्चिमी क्षेत्र मुख्यालय, मुंबई से स्थानांतरित होकर मैंने जनवरी,2001 में उत्तरी क्षेत्र मुख्यालय,लखनऊ में कार्यग्रहण किया, पिकप भवन, गोमती नगर में कार्यालय था और गोमती नगर में सहारा सिटी के पास ही गेस्ट हाउस था, जहाँ मैं लखनऊ पहुंचने पर रुका था।…

  • 9th Mar 2018

    35. जहां जाएं वहीं – सूखे, झुके मुख-माथ रहते हैं!

    जीवन यात्रा का एक और पड़ाव, लीजिए प्रस्तुत है एक और पुराना ब्लॉग! पश्चिम क्षेत्र मुख्यालय, मुंबई में मैंने मई 2000 में कार्यग्रहण किया, यहाँ मेरा दायित्व मुख्य रूप से जनसंपर्क का काम देखने का था। मुझे पवई क्षेत्र में 14 मंज़िला इमारत में, टॉप फ्लोर पर क्वार्टर मिला, सामने सड़क के पार पवई लेक…

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