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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Apr 2022

    रेत का अंबार होगा!

    ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा,वहाँ भी रेत का अंबार होगा| राजेश रेड्डी

  • 3rd Apr 2022

    मैं विद्युत् में तुम्हें निहारूँ!

    हिन्दी काव्य मंचों पर अपने समय के एक लोकप्रिय कवि स्वर्गीय गोपाल सिंह नेपाली जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| नेपाली जी का यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ था- बदनाम रहे बटमार मगर, घर तो रखवालों ने लूटा,मेरी दुल्हन-सी रातों को, नौ लाख सितारों ने लूटा| इसके अलावा फिल्मों के लिए लिखे…

  • 2nd Apr 2022

    ये डगर कुछ और ही है!

    आपके रस्ते हैं आसाँ आपकी मंजिल क़रीब,ये डगर कुछ और ही है जिस डगर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं!

    ज़िन्दगी जब मुझसे मज़बूती की रखती है उमीद,फ़ैसले की उस घड़ी में क्यूँ बिखर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं!

    सारी दुनिया से अकेले जूझ लेता हूँ कभी,और कभी अपने ही साये से भी डर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    फिर भी उधर जाता हूँ मैं!

    जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है,जाने किस उम्मीद में फिर भी उधर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    और मर जाता हूँ मैं!

    शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं,मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    सूरज का निकलना जारी है!

    तरस रहे हैं एक सहर को जाने कितनी सदियों से,वैसे तो हर रोज़ यहाँ सूरज का निकलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    उस बात का टलना जारी है!

    बरसों से जिस बात का होना, बिल्कुल तय सा लगता था,एक न एक बहाने से उस बात का टलना जारी है| राजेश रेड्डी

  • 2nd Apr 2022

    पागल दिल का मचलना जारी है!

    जाने कितनी बार ये टूटा, जाने कितनी बार लुटा,फिर भी सीने में इस पागल दिल का मचलना जारी है| राजेश रेड्डी

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