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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Jun 2022

    माज़ी फिर कुरेदा आपने!

    मेरा माज़ी फिर कुरेदा आपने।कर दिया हर ज़ख़्म ताज़ा आपने। नक़्श लायलपुरी

  • 5th Jun 2022

    समधिन!

    आज हम थोड़े पुराने ज़माने में चलते हैं| जी हाँ अठारहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ तक कविता-शायरी की दुनिया में सक्रिय रहे ज़नाब नज़ीर अकबराबादी जी की एक रचना आज शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में शायर ने अपनी समधिन के सौन्दर्य का बड़ा रोचक वर्णन प्रस्तुत किया है|…

  • 4th Jun 2022

    हिना महकी महकी!

    वो आँखों में काजल वो बालों में गजरा,हथेली पे उसके हिना महकी महकी| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    दिलरुबा महकी महकी!

    ये कौन आ गई दिलरुबा महकी महकी,फ़िज़ा महकी महकी हवा महकी महकी| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    आँख में कितने चेनाब रखते हैं!

    जहान-ए-इश्क़ में सोहनी कहीं दिखाई दे,हम अपनी आँख में कितने चेनाब रखते हैं| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    दिल की कुछ ऐसी किताब रखते हैं!

    हर एक वर्क़ में तुम ही तुम हो जान-ए-महबूबी,हम अपने दिल की कुछ ऐसी किताब रखते हैं| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं!

    वो पास बैठें तो आती है दिलरुबा ख़ुश्बू,वो अपने होठों पे खिलते गुलाब रखते हैं| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    चेहरे में सौ आफ़ताब रखते हैं!

    वो अपने चेहरे में सौ आफ़ताब रखते हैं,इसीलिये तो वो रुख़ पे नक़ाब रखते हैं| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    काँटे सभी बोतें हैं!

    होता चला आया है बेदर्द ज़माने में,सच्चाई की राहों में काँटे सभी बोतें हैं| हसरत जयपुरी

  • 4th Jun 2022

    पलकों में मोती से पिरोते हैं!

    हम अश्क जुदाई के गिरने ही नहीं देते,बेचैन सी पलकों में मोती से पिरोते हैं| हसरत जयपुरी

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