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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 28th Jun 2022

    शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है!

    सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर,मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है| क़तील शिफ़ाई

  • 28th Jun 2022

    तुझमें कितनी गहराई है!

    देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को,पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है| क़तील शिफ़ाई

  • 28th Jun 2022

    उनमें नींद पराई है!

    यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं,आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है| क़तील शिफ़ाई

  • 28th Jun 2022

    रुस्वाई ही रुस्वाई है!

    इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है,झाँकूं उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है| क़तील शिफ़ाई

  • 28th Jun 2022

    इतना सा मेरापन!

    आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…

  • 27th Jun 2022

    कोई घर भी जलाना नहीं आता!

    तारीख़ की आँखों में धुआँ हो गए ख़ुद ही,तुमको तो कोई घर भी जलाना नहीं आता। वसीम बरेलवी

  • 27th Jun 2022

    मेरी आँख में आना नहीं आता!

    ढूँढे है तो पलकों पे चमकने के बहाने,आँसू को मेरी आँख में आना नहीं आता| वसीम बरेलवी

  • 27th Jun 2022

    मुझे छोड़ के जाना नहीं आता!

    मैं भी उसे खोने का हुनर सीख न पाया,उसको भी मुझे छोड़ के जाना नहीं आता| वसीम बरेलवी

  • 27th Jun 2022

    क्यूँ वो ज़माना नहीं आता!

    पहुँचा है बुज़ुर्गों के बयानों से जो हम तक,क्या बात हुई क्यूँ वो ज़माना नहीं आता| वसीम बरेलवी

  • 27th Jun 2022

    अंदाज़ा लगाना नहीं आता!

    दुख अपना अगर हमको बताना नहीं आता,तुमको भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता| वसीम बरेलवी

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