Category: Uncategorized
-
ये तहरीर मिटाने में!
जनम जनम के सातों दुख हैं उसके माथे पर तहरीर, अपना आप मिटाना होगा ये तहरीर मिटाने में| इब्न-ए-इंशा
-
दिल के दौलत-ख़ाने में
जाने तू क्या ढूँढ रहा है बस्ती में वीराने में, लैला तो ऐ क़ैस मिलेगी दिल के दौलत-ख़ाने में| इब्न-ए-इंशा
-
विप्लव गान!
आज मैं हमारे देश के एक प्रमुख राष्ट्रवादी कवि रहे स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता का कुछ अंश हमारी स्कूल की पाठ्य पुस्तक में भी शामिल था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी की यह कविता – कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ,जिससे उथल-पुथल…
-
याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’!
याद भी हैं ऐ ‘मुनीर’ उस शाम की तन्हाइयाँ, एक मैदाँ इक दरख़्त और तू ख़ुदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
-
बेवफ़ा के सामने!
मैं तो उसको देखते ही जैसे पत्थर हो गया, बात तक मुँह से न निकली बेवफ़ा के सामने| मुनीर नियाज़ी
-
मेरी सदा के सामने!
रात इक उजड़े मकाँ पर जा के जब आवाज़ दी, गूँज उट्ठे बाम-ओ-दर मेरी सदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
-
उस हवा के सामने!
तेज़ थी इतनी कि सारा शहर सूना कर गई, देर तक बैठा रहा मैं उस हवा के सामने| मुनीर नियाज़ी
-
इस अदा के सामने!
बैठ जाता है वो जब महफ़िल में आ के सामने, मैं ही बस होता हूँ उसकी इस अदा के सामने| मुनीर नियाज़ी
-
आबादी में अकेला है!
कितने यार हैं फिर भी ‘मुनीर’ इस आबादी में अकेला है, अपने ही ग़म के नश्शे से अपना जी बहलाता है| मुनीर नियाज़ी
-
मुझसे ही शरमाता है!
मुझ से मोहब्बत भी है उसको लेकिन ये दस्तूर है उसका, ग़ैर से मिलता है हँस हँस कर मुझसे ही शरमाता है| मुनीर नियाज़ी