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ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है!
दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है, लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है!
दिल मुद्दई के हर्फ़-ए-मलामत से शाद है, ऐ जान-ए-जाँ ये हर्फ़ तिरा नाम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है!
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है, दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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काफ़ी दिन हो गये!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में उन्होंने मौत से साक्षात्कार को दर्शाने का प्रयास किया है| कभी ऐसा भी लगता है कि मौत हमारे पास से गुज़र गई है| लीजिए आज प्रस्तुत है भवानी…
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उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं!
दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के ‘फ़राज़’, कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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अम्बार से लग जाते हैं!
कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं, घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं!
पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है, फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं!
इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है, बाद में सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं!
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं, दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़