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स्वप्न के तिमिरासन्न मार्ग पर – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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पैरों में फिर सफ़र रख दे!
मंज़िलें भर दे आँख में उसकी, उसके पैरों में फिर सफ़र रख दे| शीन काफ़ निज़ाम
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मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे!
मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे, सीपियाँ हैं तो फिर गुहर* रख दे|*मोती शीन काफ़ निज़ाम
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उसने बुझा दिया होगा!
गली के मोड़ से घर तक अँधेरा क्यूँ है ‘निज़ाम’, चराग़ याद का उसने बुझा दिया होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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कोई तुझे पीछे से देखता होगा!
चुभन ये पीठ में कैसी है मुड़ के देख तो ले, कहीं कोई तुझे पीछे से देखता होगा| शीन काफ़ निज़ाम
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नाम भी इस में कहीं लिखा होगा!
पुराने वक़्तों का है क़स्र* ज़िंदगी मेरी, तुम्हारा नाम भी इस में कहीं लिखा होगा|*महल, History शीन काफ़ निज़ाम
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कहीं चाक ढूँढता होगा!
किवाड़ों पर लिखी अबजद गवाही देती है, वो हफ़्त-रंगी कहीं चाक ढूँढता होगा| शीन काफ़ निज़ाम