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अब भी जंग जारी है!
कर्बला नहीं लेकिन झूट और सदाक़त में, कल भी जंग जारी थी अब भी जंग जारी है| मंज़र भोपाली
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ये सदी हमारी है!
कह दो ‘मीर’ ओ ‘ग़ालिब’ से हम भी शेर कहते हैं, वो सदी तुम्हारी थी ये सदी हमारी है| मंज़र भोपाली
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आज तक कुँवारी है!
बाप बोझ ढोता था क्या जहेज़ दे पाता, इस लिए वो शहज़ादी आज तक कुँवारी है| मंज़र भोपाली
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गीत तुमको भा रहे हैं!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| राही जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत – मान पाया यदि नहीं कवि विश्व मुझको तो हुआ क्यायह मुझे विश्वास,…
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अब सरों की बारी है!
कुछ तो पाएँगे उस की क़ुर्बतों का ख़म्याज़ा, दिल तो हो चुके टुकड़े अब सरों की बारी है| मंज़र भोपाली
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बात बात प्यारी है!
इक अजीब ठंडक है इस के नर्म लहजे में, लफ़्ज़ लफ़्ज़ शबनम है बात बात प्यारी है| मंज़र भोपाली
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मेरे ही बुज़ुर्गों ने!
मेरे ही बुज़ुर्गों ने सर-बुलंदियाँ बख़्शीं, मेरे ही क़िबले पर मश्क़-ए-संग-बारी है| मंज़र भोपाली
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ज़ेहन ज़ेहन तारी है!
हाल ख़ूँ में डूबा है कल न जाने क्या होगा, अब ये ख़ौफ़-ए-मुस्तक़बिल ज़ेहन ज़ेहन तारी है| मंज़र भोपाली
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अब के फिर हवाओं में!
मोड़ लेने वाली है, ज़िंदगी कोई शायद, अब के फिर हवाओं में एक बे-क़रारी है| मंज़र भोपाली
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दोस्त भी शिकारी हैं!
ग़म-गुसार चेहरों पर ए‘तिबार मत करना, शहर में सियासत के दोस्त भी शिकारी हैं| मंज़र भोपाली