Category: Uncategorized
-
रुत में महकता देखूँ!
मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह,अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ| परवीन शाकिर
-
एक बच्चे की तरह!
सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँ हर बात सुनूँ,एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ| परवीन शाकिर
-
रोज़ तमाशा देखूँ!
बंद कर के मिरी आँखें वो शरारत से हँसे,बूझे जाने का मैं हर रोज़ तमाशा देखूँ| परवीन शाकिर
-
दिल को धड़कना देखूँ!
तू मिरा कुछ नहीं लगता है मगर जान-ए-हयात,जाने क्यूँ तेरे लिए दिल को धड़कना देखूँ| परवीन शाकिर
-
तिरी याद में तन्हा देखूँ!
एक इक कर के मुझे छोड़ गईं सब सखियाँ,आज मैं ख़ुद को तिरी याद में तन्हा देखूँ| परवीन शाकिर
-
होता है रोज आत्मदाह!
आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- मंदिर के पापों ने कर दिया,नगरी का आचरण सियाह,होता है रोज आत्मदाह। मौलिक प्रतिभाओं पर फतवों काबोझ लादती अकादमी,अखबारों में सेमीनारों मेंजीता है आम आदमी,सेहरों से होड़ करें कविताएंकवि का ईमान वाह-वाह।होता है रोज आत्मदाह।। जीने की गूंगी लाचारी ने,आह-अहा कुछ…
-
शाम भी हो गई!
शाम भी हो गई धुँदला गईं आँखें भी मिरी,भूलने वाले मैं कब तक तिरा रस्ता देखूँ| परवीन शाकिर
-
आँख खुल जाए तो!
नींद आ जाए तो क्या महफ़िलें बरपा देखूँ,आँख खुल जाए तो तन्हाई का सहरा देखूँ| परवीन शाकिर