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हथेली पे गाल रक्खा है
भरी बहार में इक शाख़ पर खिला है गुलाब, कि जैसे तू ने हथेली पे गाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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ख़याल रक्खा है!
हिसाब-ए-लुत्फ़-ए-हरीफ़ाँ किया है जब तो खुला, कि दोस्तों ने ज़ियादा ख़याल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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भले दिनों का भरोसा!
भले दिनों का भरोसा ही क्या रहें न रहें, सो मैंने रिश्ता-ए-ग़म को बहाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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प्रेम का सौदा!
आज एक बार फिर मैं ओज और शृंगार दोनों क्षेत्रों में श्रेष्ठतम रचनाएं देने वाले, राष्ट्रकवि स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत हैं स्वर्गीय रामधारी सिंह दिनकर जी की यह कविता – सत्य का जिसके हृदय में…
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ये किस ने पैरहन!
हवा में नश्शा ही नश्शा फ़ज़ा में रंग ही रंग, ये किस ने पैरहन अपना उछाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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लौ को सँभाल रक्खा है
अगरचे ज़ोर हवाओं ने डाल रक्खा है, मगर चराग़ ने लौ को सँभाल रक्खा है| अहमद फ़राज़
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सलामत है जिस्म अभी
ये भी बड़ा करम है सलामत है जिस्म अभी, ऐ ख़ुसरवान-ए-शहर क़बाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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दुआएँ मुझे न दो!
जो ज़हर पी चुका हूँ तुम्हीं ने मुझे दिया, अब तुम तो ज़िंदगी की दुआएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़
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सदाएँ मुझे न दो!
शो‘ला था जल-बुझा हूँ हवाएँ मुझे न दो, मैं कब का जा चुका हूँ सदाएँ मुझे न दो| अहमद फ़राज़