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सूरज से तिरा रंग!
गो रात मिरी सुब्ह की महरम तो नहीं है,सूरज से तिरा रंग-ए-हिना कम तो नहीं है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सूनी साँझ!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अत्यंत वरिष्ठ एवं श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिव मंगल सिंह सुमन जी की यह कविता – बहुत दिनों में आज…
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सच मुझे लिखना है!
ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत,सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा| शहरयार
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सोचता रोज़ हूँ मैं!
शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है,सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा| शहरयार
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तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!
देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा| शहरयार
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दरवाज़ा खुला रक्खूँगा!
तेरे वा’दे को कभी झूट नहीं समझूँगा,आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा| शहरयार