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आंधी!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री लीलाधर जगूड़ी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री लीलाधर जगूड़ी जी की यह कविता – रात वह हवा चली जिसे आँधी कहते हैंउसने कुछ दरवाजे भड़भड़ाएकुछ खिड़कियाँ झकझोरीं, कुछ पेड़ गिराएकुछ जानवरों…
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मेरी आँखों को मिरी!
मेरी आँखों को मिरी शक्ल दिखा दे कोई, काश मुझ को मिरा एहसास दिला दे कोई| नज़ीर क़ैसर
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वो बे-ज़बाँ निकले!
सितम के दौर में हम अहल-ए-दिल ही काम आए,ज़बाँ पे नाज़ था जिन को वो बे-ज़बाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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उधर भी ख़ाक उड़ी!
उधर भी ख़ाक उड़ी है इधर भी ख़ाक उड़ी,जहाँ जहाँ से बहारों के कारवाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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हक़ीक़तें हैं सलामत !
हक़ीक़तें हैं सलामत तो ख़्वाब बहुतेरे,मलाल क्यूँ हो कि कुछ ख़्वाब राएगाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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अरमाँ अभी कहाँ!
फ़क़ीर-ए-शहर के तन पर लिबास बाक़ी है,अमीर-ए-शहर के अरमाँ अभी कहाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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बहुत घुटन है कोई!
बहुत घुटन है कोई सूरत-ए-बयाँ निकले,अगर सदा न उठे कम से कम फ़ुग़ाँ निकले| साहिर लुधियानवी
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रौशनी का झुरमुट है !
क्यूँ न जज़्ब हो जाएँ इस हसीं नज़ारे में,रौशनी का झुरमुट है मस्तियों का घेरा है| साहिर लुधियानवी
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अस्ताचल की वीणा!
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रामनरेश त्रिपाठी जी की यह कविता – बाजे अस्तोदय की वीणा–क्षण-क्षण गगनांगण में रे।हुआ प्रभात छिप गए तारे,संध्या हुई भानु भी हारे,यह उत्थान…
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ख़ुशबुओं का डेरा है!
ठहरे ठहरे पानी में गीत सरसराते हैं,भीगे भीगे झोंकों में ख़ुशबुओं का डेरा है| साहिर लुधियानवी