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तमसो मा ज्योतिर्गमय!
आज मैं हिंदी नवगीत के पुरोधा स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह गीत – बुझी न दीप की शिखा अनन्त में समा गई।अमंद ज्योति प्राण-प्राण बीच जगमगा गई!अथाह स्नेह के…
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आरज़ू भी खो देते!
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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गेसुओं के साए में!
कहाँ वो शब कि तिरे गेसुओं के साए में,ख़याल-ए-सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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जो हर ख़ुशी में तिरे!
मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते,जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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मिलेगा चैन तो अब!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ,मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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अजनबी हूँ महफ़िल में!
मुआ’फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में,कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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उदास कर के मुझे !
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे,गया फिर आज का दिन भी उदास कर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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शाख़ फल तो सकती!
हुई है गर्म लहु पी के इश्क़ की तलवार,यूँ ही जिलाए जा ये शाख़ फल तो सकती है| फ़िराक़ गोरखपुरी
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रह गया सब कुछ !
आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय वीरेंद्र मिश्र जी का यह नवगीत – रह गया सब कुछ बिखर करइन दिनों है दुख शिखर पर एक पल में हो…