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बात क्या फिर कोई!
चल पड़ी रस्म जो कज-फ़हमी* की,बात क्या फिर कोई कर पाएगा| *Misunderstanding क़तील शिफ़ाई
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राणाप्रताप की तलवार!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा अपनी ओजपूर्ण रचनाओं के लिए ख्यातिप्राप्त स्वर्गीय श्यामनारायण पांडेय जी की एक प्रसिद्ध कविता शेयर कर रहा हूँ। इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय श्यामनारायण पांडेय जी की यह कविता – चढ़ चेतक पर तलवार उठा,रखता था भूतल पानी को।राणा…
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आग का दरिया देखूँ|!
टूट जाएँ कि पिघल जाएँ मिरे कच्चे घड़े,तुझ को मैं देखूँ कि ये आग का दरिया देखूँ| परवीन शाकिर
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और भी तुझ सा देखूँ!
तू मिरी तरह से यकता है मगर मेरे हबीब,जी में आता है कोई और भी तुझ सा देखूँ| परवीन शाकिर
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ख़्वाब बन कर तिरी!
मैं ने जिस लम्हे को पूजा है उसे बस इक बार,ख़्वाब बन कर तिरी आँखों में उतरता देखूँ| परवीन शाकिर
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फूल की तरह मिरे!
फूल की तरह मिरे जिस्म का हर लब खुल जाए,पंखुड़ी पंखुड़ी उन होंटों का साया देखूँ| परवीन शाकिर
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मुझ पे छा जाए वो!
मुझ पे छा जाए वो बरसात की ख़ुश्बू की तरह,अंग अंग अपना इसी रुत में महकता देखूँ| परवीन शाकिर
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एक बच्चे की तरह से!
सब ज़िदें उस की मैं पूरी करूँ हर बात सुनूँ,एक बच्चे की तरह से उसे हँसता देखूँ| परवीन शाकिर