Category: Uncategorized
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मेरी तन्हाई की!
मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई,वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा। शहरयार
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तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा!
देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है,आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा। शहरयार
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दरवाज़ा खुला रक्खूँगा!
तेरे वा’दे को कभी झूट नहीं समझूँगा,आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा। शहरयार
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धूप सड़क की!
आज मैं श्रेष्ठ राजस्थानी एवं हिंदी कवि स्वर्गीय हरीश भादानी जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| भादानी जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरीश भादानी जी का यह गीत – धूप सड़क की नहीं सहेली जब कोरे मेड़ी ही कोरेछत पसरी पसवाड़े फोरेछ्जवालों से…
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रोना नसीब में है!
रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला,अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े। सुदर्शन फ़ाकिर