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यों अन्धेरा अभी पी रहा हूँ!
आज मैं हिंदी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ। शंभुनाथ जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत – यों अन्धेरा अभी पी रहा हूँ, रोशनी के लिए जी रहा हूँ । एक अन्धे…
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नाम होंटों पे तिरा!
नाम होंटों पे तिरा आए तो राहत सी मिले,तू तसल्ली है दिलासा है दुआ है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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तू कोई झील है!
रूह की प्यास बुझा दी है तिरी क़ुर्बत ने,तू कोई झील है झरना है घटा है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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तेरी आँखों में कई!
तेरी आँखों में कई रंग झलकते देखे,सादगी है कि झिझक है कि हया है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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कोई झंकार है नग़्मा!
कोई झंकार है नग़्मा है सदा है क्या है,तू किरन है के कली है के सबा है क्या है| नक़्श लायलपुरी
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ज़ुल्म करना है तो!
नाले ‘बेख़ुद’ के क़यामत हैं तुझे याद रहे,ज़ुल्म करना है तो पत्थर का जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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राह नज़दीक की!
दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का है मक़ाम,राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफ़र पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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ये कमाँ क़ातिल की!
मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की,तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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अभी घर पैदा कर!
मुझ से घर आने के वादे पर बिगड़ कर बोले,कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी
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रंज सहने को हमारा!
शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं,रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर| बेख़ुद देहलवी