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जो तेरे शहर में!
उन्हीं पे सारे मसाइब का बोझ रक्खा है,जो तेरे शहर में ईमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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हम उस निगाह का!
ये ज़ख़्म-ए-दिल नहीं एहसान की निशानी है, हम उस निगाह का एहसान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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झुलसते ख़्वाबों की!
हमारे पास फ़क़त धूप है ख़यालों की,झुलसते ख़्वाबों की दुक्कान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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इन आँसुओं का कोई!
इन आँसुओं का कोई क़द्र-दान मिल जाए,कि हम भी ‘मीर’ का दीवान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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बुझे बुझे से कुछ!
चराग़-ए-क़ुर्ब से कर दीजिए उन्हें रौशन,बुझे बुझे से कुछ अरमान ले के आए हैं| मंज़र भोपाली
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तेरे शहर से हो कर!
तेरे शहर से हो कर आई तेज़ हवा,फिर दिल की बुनियाद हिला कर बैठ गई| इरशाद ख़ान सिकंदर
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फालतू चीज़!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री विष्णु नागर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ। नागर जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विष्णु नागर जी की यह कविता – घर में कोई चीज़फालतू नहीं थीटूटा कंघा लगता थाअमर हैभरोसा था अब खोएगा भी नहीं…