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दुनिया-ए-मोहब्बत!
दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया,अब क्या है जिस पर नाज़ करें इक दिल था वो भी टूट गया। शमीम जयपुरी
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बहुत से शे’र मुझ से!
बहुत से शे‘र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर, बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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कहीं ऐसा न हो!
नज़र-अंदाज़ कर मुझ को ज़रा सा खुल के जीने दे,कहीं ऐसा न हो तेरी निगहबानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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वीराने से मर जाऊँ!
ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं,अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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आसानी से मर जाऊँ!
मैं इतना सख़्त-जाँ हूँ दम बड़ी मुश्किल से निकलेगा,ज़रा तकलीफ़ बढ़ जाए तो आसानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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हैरानी से मर जाऊँ!
तुम उस को देख कर छू कर भी ज़िंदा लौट आए हो,मैं उस को ख़्वाब में देखूँ तो हैरानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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मैं पानी से मर जाऊँ!
लब-ए-साहिल समुंदर की फ़रावानी से मर जाऊँ,मुझे वो प्यास है शायद कि मैं पानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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न जाने किधर गया वो!
वो रात का बे-नवा मुसाफ़िर वो तेरा शाइर वो तेरा ‘नासिर’,तिरी गली तक तो हम ने देखा था फिर न जाने किधर गया वो| नासिर काज़मी