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रावण और विभीषण!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- कितना समझाओगे विभीषण क्या मान जाएगा दशानन। कोई लाभ नहीं है मित्र जिसके कांधों पर दस सिर हैं ऐश्वर्य, अहंकार, सामाजिक प्रतिष्ठा वह कैसे झुकेगा किसी के सामने भले ही वह ईश्वर ही क्यों न हो। खुद तुम घर के भेदी कहलाओगे, करुणा…
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क्या ज़रूरी है कि!
क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए,मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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वैसी तो दुनिया नहीं!
जैसी होनी चाहिए थी वैसी तो दुनिया नहीं,दुनिया-दारी भी ज़रूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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आदमी में आदमिय्यत!
भूल थी अपनी फ़रिश्ता आदमी में ढूँडना,आदमी में आदमिय्यत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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मैले हो जाते हैं रिश्ते!
मैले हो जाते हैं रिश्ते भी लिबासों की तरह,दोस्ती हर दिन की मेहनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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वो नहीं तो कोई तो!
वो नहीं तो कोई तो होगा कहीं उस की तरह,जिस्म में जब तक हरारत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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हम कहाँ के देवता !
हम कहाँ के देवता हैं बेवफ़ा वो हैं तो क्या,घर में कोई घर की ज़ीनत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली
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चलो यूँ ही सही!
आनी जानी हर मोहब्बत है चलो यूँ ही सही,जब तलक है ख़ूबसूरत है चलो यूँ ही सही| निदा फ़ाज़ली