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भाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे।
आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- ना ये टूटे, ना ये हारेभाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे। जब भी ऊंचे सपने देखेभटके हैं हम मारे-मारे। बांधे से ये कब बंधते हैंभाव उदधि, नदिया के धारे। आखिर शांत बैठना होगा,कितना तुम उड़ते हो प्यारे स्लेट पर लिखावट जैसे हैंक्षणभंगुर संकल्प हमारे। बैठो कुछ पल…
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तुझे मैं कैसे बताऊँ!
तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही,उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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हमारी उम्र खिलौनों!
नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की,हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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झूम रहीं बालियां!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता – रे देखो खेतों में झूम रहीं बालियां।फल और फूलों से,पटरी के झूलों…
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तमाम शहर में !
तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही,कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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तमाम गर्द किताबों में !
तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं,तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना
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वो फ़ाख़्ता जो मुझे!
वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी,बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई| मुनव्वर राना