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ये भी तो सज़ा है!
ये भी तो सज़ा है कि गिरफ़्तार-ए-वफ़ा हूँक्यूँ लोग मोहब्बत की सज़ा ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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हम अपने गुनाहों में!
कुछ देर ठहर जाइये बंदा-ए-इन्साफ़,हम अपने गुनाहों में ख़ता ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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बुढ़िया!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अशोक वाजपेयी जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। वाजपेयी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक वाजपेयी जी की यह कविता – बुढ़िया की झोली मेंकुछ फल थे सूखे हुए,कुछ दबी हुई आकांक्षाएँ,कुछ अनकहे रह…
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हम लोग भी नादाँ हैं!
दुनिया से वफ़ा करके सिला ढूँढ रहे हैं,हम लोग भी नादाँ हैं ये क्या ढूँढ रहे हैं। सुदर्शन फ़ाकिर
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आज संदूक़ से वो !
आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे,आज संदूक़ से वो ख़त तो निकालो यारो| दुष्यंत कुमार
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इस बहकती हुई!
रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया,इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो| दुष्यंत कुमार
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आज सय्याद को!
लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे,आज सय्याद को महफ़िल में बुला लो यारो| दुष्यंत कुमार
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भाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे।
आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- ना ये टूटे, ना ये हारेभाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे। जब भी ऊंचे सपने देखेभटके हैं हम मारे-मारे। बांधे से ये कब बंधते हैंभाव उदधि, नदिया के धारे। आखिर शांत बैठना होगा,कितना तुम उड़ते हो प्यारे स्लेट पर लिखावट जैसे हैंक्षणभंगुर संकल्प हमारे। बैठो कुछ पल…