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काँटे बोने वाले!
काँटे बोने वाले सच-मुच तू भी कितना भोला है,जैसे राही रुक जाएँगे तेरे काँटे बोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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मिट सकते हैं धोने से|!
बाद-अज़-वक़्त पशीमाँ हो कर ज़ख़्म नहीं भर सकते तुम,दामन के धब्बे अलबत्ता मिट सकते हैं धोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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घर के कोने कोने से!
फ़र्क़ नहीं पड़ता हम दीवानों के घर में होने से,वीरानी उमड़ी पड़ती है घर के कोने कोने से| मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
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पागल हवाएं थीं!
आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- साथ में अपने महज़ पागल हवाएं थींदूर आंखें मिचमिचाती सी दिशाएं थीं। दिग्विजय का स्वप्न भी हमने नहीं पालायात्रा को बस हमारा स्वत्व दे डालारहे चलते मान यह कर्तव्य है अपनाहै कहीं मंज़िल, वहम भी यह नहीं पाला, साथ में कुछ धारणाएं, कुछ दुआएं थीं।…