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ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ !
ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ था मैं बहार में तू,मगर ये फ़स्ल-ए-सितम-आश्ना किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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सदा किसी की नहीं!
ये शहर सेहर-ज़दा* है सदा किसी की नहीं,यहाँ ख़ुद अपने लिए भी दुआ किसी की नहीं| *खौफनाक अहमद फ़राज़
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बुत से दोस्ताना किया!
वो हीला-गर जो वफ़ा-जू भी है जफ़ा-ख़ू भी,किया भी ‘फ़ैज़’ तो किस बुत से दोस्ताना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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कब जाओगे बादल!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- वापस कब जाओगे बादलरस्ता भूल गए। जहाँ ज़रूरत नहीं रही अबअटके हो ग़ोवा मेंबुला रही रजधानी उलझी हैविष भरी हवा में, कैसे लानी है मौसम मेंसमता भूल गए। कुछ तो अनुशासन सीखो तुमबादल मेरे भाई,कहीं बरसते बे मौसम परकहीं बूंद न आई यूं…
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सहा तो क्या न सहा!
थे ख़ाक-ए-राह भी हम लोग क़हर-ए-तूफ़ाँ भी,सहा तो क्या न सहा और किया तो क्या न किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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सुलूक जिससे किया!
ग़म-ए-जहाँ हो रुख़-ए-यार हो कि दस्त-ए-अदू,सुलूक जिस से किया हम ने आशिक़ाना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ये किस ख़लिश ने!
ये किस ख़लिश ने फिर इस दिल में आशियाना किया,फिर आज किस ने सुख़न हम से ग़ाएबाना किया| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जितना लहू था सर्फ़!
उन की नज़र में क्या करें फीका है अब भी रंग,जितना लहू था सर्फ़-ए-क़बा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अपना इख़्तियार है !
अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें,रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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ख़फ़ा कर चुके हैं हम!
देखें है कौन कौन ज़रूरत नहीं रही,कू-ए-सितम में सब को ख़फ़ा कर चुके हैं हम| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़