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हमने क्या बुराई की!
तंज़ ओ ता’ना ओ तोहमत सब हुनर हैं नासेह के, आप से कोई पूछे हम ने क्या बुराई की| अहमद फ़राज़
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खुद से कर लें बात!
आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- पढ़ने वाला भले न कोईप्रेरित हुए भवानी जी सेलिखते रहते हम दिन-रात। पढ़कर सम्मति दे यदि कोईक्या तब अर्थ बदल जाएंगे व्यस्त सभी अपने कर्मों मेंहमको पढ़ने क्यों आएंगे, ये दुनिया तो है अपनी भीकविता में कह लेंगे हम भी निज सुख-दुख, जज़्बात।…
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कौन अब ख़बर लावे!
तर्क कर चुके क़ासिद कू-ए-ना-मुरादाँ को, कौन अब ख़बर लावे शहर-ए-आश्नाई की| अहमद फ़राज़
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आज उनसे मजबूरन!
तज दिया था कल जिन को हम ने तेरी चाहत में,आज उन से मजबूरन ताज़ा आश्नाई की| अहमद फ़राज़
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या तो टूट कर रोया!
वर्ना अब तलक यूँ था ख़्वाहिशों की बारिश में,या तो टूट कर रोया या ग़ज़ल-सराई की| अहमद फ़राज़
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शिद्दतें जुदाई की!
इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की,आज पहली बार उस से मैं ने बेवफ़ाई की| अहमद फ़राज़
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मैं आज ज़द पे अगर!
मैं आज ज़द पे अगर हूँ तो ख़ुश-गुमान न हो,चराग़ सब के बुझेंगे हवा किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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निगाह-ए-यार मगर!
सब अपने अपने फ़साने सुनाते जाते हैं,निगाह-ए-यार मगर हम-नवा किसी की नहीं| अहमद फ़राज़
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ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था!
आज एक बार फिर मैं अपने यूटयूब चैनल के माध्यम से अपने स्वर में मुकेश जी की गाई हुई एक गैर फिल्मी ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ जिसके शायर है जान निसार अख्तर जी, बोल हैं- ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था, दिल ए तबाह ने भी क्या मिजाज़ पाया था लीजिए…
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ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ !
ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ था मैं बहार में तू,मगर ये फ़स्ल-ए-सितम-आश्ना किसी की नहीं| अहमद फ़राज़