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तुझको चलना होगा!
आज मैं 1970 में रिलीज़ हुई फिल्म- सफर का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इस फिल्म में राजेश खन्ना और शर्मिला टैगोर प्रमुख भूमिकाओं में थे और बहुत ही प्रभावशाली कहानी और अभिनय इस फिल्म की विशेषता थी| जहां तक मुझे याद है यह फिल्म प्रेम त्रिकोण पर आधारित है, नायिका शर्मिला टैगोर अपने…
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माँ है रेशम के कारख़ाने में!
अली सरदार जाफरी साहब की एक नज़्म आज शेयर कर रहा हूँ| इस रचना में पिछड़े वर्ग के लोगों की ज़िंदगी का ऐसा चित्रण किया गया है, जिनकी हालत पीढ़ी दर पीढ़ी एक जैसी बनी रहती है, कोई सपने नहीं, कोई बदलाव की उम्मीद नहीं है| जाफरी साहब एक प्रगतिशील शायर थे, मुद्दतों पहले उन्होंने…
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इसे दोस्ती नाम क्यों दे दिया!
आज एक बार फिर से मुझे अपने प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत याद आ रहा है| संभव है यह गीत मैंने पहले भी शेयर किया हो| 1956 में रिलीज़ हुई फिल्म- देवर के लिए यह गीत आनंद बख्शी जी ने लिखा था और रोशन जी के संगीत निर्देशन में मुकेश जी ने…
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धैर्य- रवीन्द्रनाथ ठाकुर
आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत किया गया है। मैं अनुवाद के लिए अंग्रेजी में मूल कविताएं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध काव्य…
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आज ये आँचल मुँह क्यों छुपाये!
एक बार फिर से मैं आज अपने सर्वाधिक प्रिय गायक मुकेश जी का गाया एक गीत शेयर कर रहा हूँ| मुकेश जी दर्द भरे गीतों के सरताज माने जाते हैं लेकिन रोमांटिक गीत भी उन्होंने एक से एक अच्छे गाये हैं| आज का यह गीत 1963 में रिलीज़ हुई फिल्म – ‘हॉलिडे इन…
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Mediocrity versus Merit!
Today I am talking about common people, yes- the people who form the majority anywhere and they bring all the changes in the world. It is said that these are middle class, but I would say these are mediocre people. In the process of progression anybody can be a part of middle class or…
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मैं क्या जिया ?
आज डॉ धर्मवीर भारती जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| भारती जी ने कविता, कहानी, उपन्यास आदि सभी विधाओं में अपना बहुमूल्य योगदान किया था| उनकी कुछ रचनाएँ- सूरज का सातवाँ घोडा, अंधा युग, ठंडा लोहा, ठेले पर हिमालय, सात गीत वर्ष आदि काफी प्रसिद्ध रहीं| वे साप्ताहिक पत्रिका- धर्मयुग के यशस्वी संपादक…
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संसद से राजघाट तक फैले हुए हैं आप!
श्री कुबेर दत्त जी मेरे मित्र रहे थे जब वे संघर्ष कर रहे थे, दूरदर्शन में स्थापित होने से पहले| अत्यंत भावुकतापूर्ण गीत लिखा करते थे, अखबारों में छपने के लिए परिचर्चाएँ किया करते थे| एक परिचर्चा का शीर्षक मुझे अभी तक याद है- ‘ज़िंदगी है क़ैद पिंजरों में’ जिसमें उन्होंने मुझे भी शामिल किया…