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सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरी!
सुर्ख होठों पे उफ़ ये हँसी मदभरीजैसे शबनम अंगारो की मेहमान होजादू बुनती हुई ये नशीली नज़रदेख ले तो खुदाई परेशान होमुस्कुराओ न ऐसेमुस्कुराओ न ऐसे चुराकर नज़रआइना देख सूरत मचल जाएगा| नई उम्र की नई फसल
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ये शरमसार मौसम बदल जाएगा!
साँस की तो बहुत तेज़ रफ़्तार हैऔर छोटी बहुत है मिलन की घडीगूंथते गूंथते ये घटा साँवरीबुझ न जाए कही रूप की फुलझड़ीचूड़ियाँ ही न तुमचूड़ियाँ ही न तुम खनखनाती रहोये शरमसार मौसम बदल जाएगा| नई उमर की नई फसल
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देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम !
देखती ही रहो आज दर्पण ना तुम प्यार का ये महूरत निकल जाएगादेखती ही रहो आज दर्पण ना तुमप्यार का ये महूरत निकल जाएगा| नई उम्र की नई फसल
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पी जा हर अपमान!
आज एक बार फिर गीतों की दुनिया के एक पुराने हस्ताक्षर स्वर्गीय बाल स्वरूप ‘राही’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ | राही जी ने कुछ बहुत अच्छे गीतों और ग़ज़लों का उपहार हमें दिया है| उनको कवि सम्मेलनों में सुनने का भी अवसर मुझे मिला था, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी…
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सारा जहां हमारा 6
पतला है हाल-ए-अपना, लेकिन लहू है गाढ़ाफौलाद से बना है, हर नौजवाँ हमारा| मिल-जुलके इस वतन को, ऐसा सजायेंगे हमहैरत से मुँह तकेगा सारा जहाँ हमारा| चीन-ओ-अरब हमारा … वो सुबह कभी तो आएगी
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सारा जहां हमारा 5
तालीम है अधूरी, मिलती नही मजूरीमालूम क्या किसीको, दर्द-ए-निहाँ हमाराचीन-ओ-अरब हमारा … फिर सुबह होगी
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सारा जहां हमारा 4
होने को हम कलन्दर, आते हैं बोरी बन्दरहर एक कुली यहाँ का है राज़दाँ हमाराचीन-ओ-अरब हमारा …
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सारा जहां हमारा 3
जितनी भी बिल्डिंगें थीं, सेठों ने बाँट ली हैंफ़ुटपाथ बम्बई के हैं आशियाँ हमारा|चीन-ओ-अरब हमारा … फिर सुबह होगी
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सारा जहां हमारा 2
खोली भी छिन गई है, बेन्चें भी छिन गई हैंसड़कों पे घूमता है अब कारवाँ हमाराजेबें हैं अपनी खाली, क्यों देता वरना गालीवो सन्तरी हमारा, वो पासबाँ हमाराचीन-ओ-अरब हमारा … फिर सुबह होगी