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फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त!
फ़र्ज़ करो ये जोग बिजोग का हमने ढोंग रचाया हो,फ़र्ज़ करो बस यही हक़ीक़त बाक़ी सब कुछ माया हो| इब्ने इंशा
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फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा!
फ़र्ज़ करो ये रोग हो झूठा, झूठी प्रीत हमारी हो,फ़र्ज़ करो इस प्रीत के रोग में सांस भी हम पर भारी हो| इब्ने इंशा
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फ़र्ज़ करो ये जी की बिपदा!
फ़र्ज़ करो ये जी की बिपदा, जी से जोड़ सुनाई हो,फ़र्ज़ करो अभी और हो इतनी, आधी हमने छुपाई हो| इब्ने इंशा
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फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों!
फ़र्ज़ करो हम अहले वफ़ा हों, फ़र्ज़ करो दीवाने हों,फ़र्ज़ करो ये दोनों बातें झूठी हों अफ़साने हों| इब्ने इंशा
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जिनमें बयाँ याद रहेगा!
कुछ मीर के अबियत थे, कुछ फ़ैज़ के मिसरे,एक दर्द का था जिनमें बयाँ याद रहेगा| इब्ने इंशा
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वो दर्द कि उठा था यहाँ!
वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगा,वो दर्द कि उठा था यहाँ याद रहेगा| इब्ने इंशा
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रुख़सत का समां याद रहेगा!
उस शाम वो रुख़सत का समां याद रहेगा,वो शहर, वो कूचा, वो मकाँ याद रहेगा| इब्ने इंशा
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अपमान!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बहुत सहज अंदाज़ में गहरी बात कह जाते थे|लीजिए प्रस्तुत है भवानी दादा की यह कविता जो हमारे मन में बहुत सी बार पैदा होने वाले अपमान के भाव का सामना…