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समय की शिला पर मधुर चित्र कितने!
आज हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि और नवगीत आंदोलन के प्रणेता स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| इत्तेफाक से मैं कभी उनके कभी दर्शन नहीं कर पाया लेकिन किसी रचनाकार से असली जुड़ाव तो उसकी रचनाओं के माध्यम से ही होता है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का…
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मेरा अंगूठा काट जाती है!
किसी कुटिया को जब “बेकल”महल का रूप देता हूँ,शंहशाही की ज़िद्द मेरा अंगूठा काट जाती है| बेकल उत्साही
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गर्मी का महीना काट जाती है!
तेरी वादी से हर इक साल बर्फ़ीली हवा आकर,हमारे साथ गर्मी का महीना काट जाती है| बेकल उत्साही
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पत्ता काट जाती है!
अजब है आजकल की दोस्ती भी, दोस्ती ऐसी,जहाँ कुछ फ़ायदा देखा तो पत्ता काट जाती है| बेकल उत्साही
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कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है!
पहुँच जाती हैं दुश्मन तक हमारी ख़ुफ़िया बातें भी,बताओ कौन सी कैंची लिफ़ाफ़ा काट जाती है| बेकल उत्साही
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मेरा रस्ता काट जाती है!
ये दुनिया तुझसे मिलने का वसीला काट जाती है,ये बिल्ली जाने कब से मेरा रस्ता काट जाती है| बेकल उत्साही
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तुम रहे न तुम, हम रहे न हम!
भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में लता मंगेशकर जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं| आज मैं लता मंगेशकर जी द्वारा गुरुदत्त जी की फिल्म – ‘कागज़ के फूल’ के लिए गाये गए एक गीत के बोल शेयर कर रहा हूँ, जिसका संगीत सचिन दा अर्थात सचिन देव बर्मन जी ने दिया था| ज़िंदगी में…
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मिलना बहुत जरूरी है!
हमने देखा है बिछुड़ों कोमिलना बहुत जरूरी है।उतने ही हम पास रहेंगे,जितनी हममें दूरी है। डॉ. कुंवर बेचैन
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धरती पर आते हैं पंछी!
सुबह हुए तो मिले रात-दिनमाना रोज बिछुड़ते हैं,धरती पर आते हैं पंछीचाहे ऊँचा उड़ते हैं,सीधे सादे रस्ते भी तोकहीं कहीं पर मुड़ते हैं,अगर हृदय में प्यार रहे तोटूट टूटकर जुड़ते हैं| (गीत-अंश) डॉ. कुंवर बेचैन
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जिस मृग पर कस्तूरी है!
गीत अंश जंगल जंगल भटकेगा हीजिस मृग पर कस्तूरी है।उतने ही हम पास रहेंगे,जितनी हममें दूरी है। डॉ. कुंवर बेचैन