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व्यक्तिगत!
आज मैं एक बार फिर स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा आधुनिक हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण स्तंभ थे| वे बातचीत के लहज़े में कविता लिखने के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे| अनेक महत्वपूर्ण साहित्यिक पुरस्कारों से अलंकृत भवानी दादा का काव्य पाठ सुनना एक…
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किसको इल्ज़ाम दूँ मैं!
किसको इल्ज़ाम दूँ मैं किसको ख़तावार कहूँ,मेरी बरबादी का बाइस तो छुपा है मुझमें| राजेश रेड्डी
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इक दश्त बचा है मुझमें!
इक ज़माना था कई ख्वाबों से आबाद था मैं,अब तो ले दे के बस इक दश्त बचा है मुझमें| राजेश रेड्डी
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मैं समुन्दर हूँ उदासी का—
मैं समुन्दर हूँ उदासी का अकेलेपन का,ग़म का इक दरिया अभी आके मिला है मुझमें| राजेश रेड्डी
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मुझसे ख़फ़ा है मुझमें!
हँसना चाहूँ भी तो हँसने नहीं देता मुझको,ऐसा लगता है कोई मुझसे ख़फ़ा है मुझमें| राजेश रेड्डी
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वो ढूँढ रहा है मुझमें!
मेरे चहरे पे मुसलसल हैं निगाहें उसकी,जाने किस शख़्स को वो ढूँढ रहा है मुझमें| राजेश रेड्डी
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मिट्टी है, हवा है मुझमें!
आग है, पानी है, मिट्टी है, हवा है मुझमें,मुझको ये वहम नहीं है कि खु़दा है मुझमें| राजेश रेड्डी