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ठहरा हुआ दरिया है!
दिल से जो छटे बादल तो आँख में सावन है,ठहरा हुआ दरिया है बहता हुआ पानी है| बशीर बद्र
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पत्थर की हिफ़ाज़त में!
इक ज़ेहन-ए-परेशाँ में ख़्वाब-ए-ग़ज़लिस्ताँ है,पत्थर की हिफ़ाज़त में शीशे की जवानी है| बशीर बद्र
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बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं अपने स्वर में मुकेश जी का गाया यह प्रसिद्ध गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसे नीरज जी ने लिखा था- बस यही अपराध मैं हर बार करता हूँ,आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ। आशा है आपको पसंद आएगा।धन्यवाद ।
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ख़ुद राह बना लेगा!
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है,ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है| बशीर बद्र
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केवल तुम – रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट| आज, मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद…
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किसने क्या लिक्खा है!
कौन पढ़ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें,किस ने क्या लिक्खा है ये आब-ए-रवाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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चाँद से फूल से या!
चाँद से फूल से या मेरी ज़बाँ से सुनिए,हर जगह आप का क़िस्सा है जहाँ से सुनिए| निदा फ़ाज़ली
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अपनी इज़्ज़त भी यहाँ!
शहर में सब को कहाँ मिलती है रोने की जगह,अपनी इज़्ज़त भी यहाँ हँसने हँसाने से रही| निदा फ़ाज़ली