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न पूछा दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है!
कोई अगर पूछता ये हमसे बताते हम गर तो क्या बताते, भला हो सबका कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यूँ है| जावेद अख़्तर
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मुझको तेरी तलाश क्यूँ है!
कभी कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यूँ है, कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इर्तिआ’श क्यूँ है| जावेद अख़्तर
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कभी-कभी बहुत भला लगता है!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, ये एक प्रसिद्ध कवि थे और मैंने इनकी रचनाएं पहले भी शेयर की हैं| लीजिए प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की यह रचना- कभी-कभी बहुत भला लगता है —चुप-चुप सब कुछ सुननाऔर कुछ न बोलना…
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इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें!
ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें, इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं!
देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ, मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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ख़्वाब पलकों पे सजाने के लिए हैं!
आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे, ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं!
सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की, वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं!
अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें, कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं!
अशआ’र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं, कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं| जाँ निसार अख़्तर
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रात गए कोई किरन मेरे बराबर!
जब रात गए कोई किरन मेरे बराबर, चुप-चाप सी सो जाए तो लगता है कि तुम हो| जाँ निसार अख़्तर