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ज़रा फ़ासले से मिला करो!
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो| बशीर बद्र
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दिखावे की दोस्ती न मिला!
मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला, अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला| बशीर बद्र
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लेकिन ये गुंजाइश रहे!
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों| बशीर बद्र
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क़ब्र से कम दी है ज़मीं!
ज़िंदगी तूने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं, पाँव फैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है| बशीर बद्र
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उजाले अपनी यादों के…
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए| बशीर बद्र
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वह हवा पहाड़ी!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के अपनी तरह के अनूठे गीतकार आदरणीय बुदधिनाथ मिश्र जी का एक गीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं और यह भी दोहराना मुझे अच्छा लगता है कि मैं और डॉक्टर मिश्र जी ने किसी समय एक ही संस्थान हिंदुस्तान…
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अब शायरी है और मैं हूं!
जहां न सुख का हो अहसास और न दुख की कसक,उसी मक़ाम पे अब शायरी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’
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अजब तिश्नगी है और मैं हूं!
किसी मक़ाम पे रुकने को जी नहीं करता,अजीब प्यास, अजब तिश्नगी है और मैं हूं| कृष्ण बिहारी ‘नूर’