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कहाँ अब वो मकीं रहता है!
जिसकी साँसों से महकते थे दर-ओ-बाम तिरे, ऐ मकाँ बोल कहाँ अब वो मकीं रहता है| अहमद मुश्ताक़
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शहर की गलियों में कहीं रहता है!
मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है, वो इसी शहर की गलियों में कहीं रहता है| अहमद मुश्ताक़
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मगर आँसू निकल पड़े!
मुद्दत के बा’द उसने जो की लुत्फ़ की निगाह, जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े| कैफ़ी आज़मी
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नाम पे जिसके उबल पड़े!
साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर, मय है उसी की नाम पे जिसके उबल पड़े| कैफ़ी आज़मी
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कलेजा निकल पड़े!
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क, यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े| कैफ़ी आज़मी
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ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े!
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े, हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े| कैफ़ी आज़मी
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ओढ़ आए हम!
आज फिर से मैं हिन्दी के श्रेष्ठ गीतकार और श्रेष्ठ मंच संचालक श्री सोम ठाकुर जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| सोम जी ने हिन्दी के अलावा ब्रज भाषा में भी अनेक सुंदर गीत, कवितओं की सौगात हमें दी है| वे प्रेम के कवि तो हैं ही इसके अलावा उन्होंने राष्ट्र प्रेम और…
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कुछ भी यहाँ नहीं मिलता!
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में, तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता!
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे, कि जिनमें शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी
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मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता!
जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ, यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता| कैफ़ी आज़मी