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शाम के वक़्त कभी!
आज फिर से मैं हिन्दी के एक अत्यंत चर्चित और सृजनशील रचनाकार श्री सूर्यभानु गुप्त जी एक रचना शेयर कर रहूँ| श्री सूर्यभानु गुप्त जी के बहुत से शेर मैं अक्सर उद्धृत करता हूँ जैसे- ‘दिलवाले फिरते हैं दर-दर सिर पर अपनी खाट लिए’, ‘जब अपनी प्यास के सहरा से डर गया हूँ मैं’ आदि|…
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नींद उड़ा देनी चाहिए!
मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे, मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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मुझको दुआ देनी चाहिए!
मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो, मैं सब्र हूँ तो मुझको दुआ देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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ख़ाक उड़ा देनी चाहिए!
मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग, मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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आग बुझा देनी चाहिए!
मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब, मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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नक़ाब उठा देनी चाहिए!
मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना, तुझको भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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ला के छुपा देनी चाहिए!
दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं, दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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पूँजी लगा देनी चाहिए!
अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में, है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए| राहत इंदौरी
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बहुत छोटी जगह!
आज मैं हिन्दी के अनूठे कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की कविता शेयर कर रहा हूँ, जो बातचीत के लहज़े में सहज रूप से ही दिव्य बात कह जाते थे| भवानी दादा की आज की कविता परिवार के वातावरण पर आधारित है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता…