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गीत-आघात!
फिर से आज मैं हिन्दी के मूर्धन्य कवि स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| भवानी दादा बहुत सहज तरीके से गहरी बात कह देते थे| उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानी प्रसाद मिश्र जी की यह कविता– तोड़ रहे…
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शहर में हैं वो सूरतें बाक़ी!
जिनके होने से हम भी हैं ऐ दिल, शहर में हैं वो सूरतें बाक़ी| मुनीर नियाज़ी
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मुर्दा लोगों की आदतें बाक़ी!
ज़िंदा लोगों की बूद-ओ-बाश में हैं, मुर्दा लोगों की आदतें बाक़ी| मुनीर नियाज़ी
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और हैं कितनी मंज़िलें बाक़ी!
और हैं कितनी मंज़िलें बाक़ी, जान कितनी है जिस्म में बाक़ी| मुनीर नियाज़ी
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चाहता था पर ऐसा नहीं हुआ!
मिलना था एक बार उसे फिर कहीं ‘मुनीर’, ऐसा मैं चाहता था पर ऐसा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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यहाँ रहे हैं ये अपना नहीं हुआ!
मुश्किल हुआ है रहना हमें इस दयार में, बरसों यहाँ रहे हैं ये अपना नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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जिसमें कोई हम-सफ़र नहीं!
ऐसा सफ़र है जिसमें कोई हम-सफ़र नहीं, रस्ता है इस तरह का जो देखा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी
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चुप हुआ कि तमाशा नहीं हुआ!
रंज-ए-फ़िराक़-ए-यार में रुस्वा नहीं हुआ, इतना मैं चुप हुआ कि तमाशा नहीं हुआ| मुनीर नियाज़ी