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यहाँ तो सबकी ख़्वाहिश!
यहाँ तो सब की ख़्वाहिश एक सी है रोटियाँ, सिक्केमेरे युग में नहीं ख़्वाब-ए-जवानी माँगने वाले। मंज़र भोपाली
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तरसते हैं बहुत से लोग!
ख़ुदा ने मुझ को बिन-माँगे ये नेमत दी है ‘मंज़र’,तरसते हैं बहुत से लोग ममता देखने को। मंज़र भोपाली
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कमानों में खिंचे हैं!
कमानों में खिंचे हैं तीर तलवारें हैं चमकी,ज़रा ठहरो कहाँ जाते हो दरिया देखने को। मंज़र भोपाली
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बहेलिए
मेरे यूट्यूब चैनल के माध्यम से प्रस्तुत है मेरी कविता बहेलिए जो राजनीतिज्ञों की लालच देकर वोट पाने और उसके बाद जनता को भूल जाने की प्रवृत्ति पर आधारित है- बहेलिए – मेरी एक कविता आशा है आपको यह कविता पसंद आएगी,धन्यवाद। ******
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बहुत से आइना-ख़ाने!
बहुत से आइना-ख़ाने हैं इस बस्ती में लेकिनतरसती है हमारी आँख चेहरा देखने को। मंज़र भोपाली
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तमाशा देखने को!
खड़े हैं राह चलते लोग कितनी ख़ामुशी से,सड़क पर मरने वालों का तमाशा देखने को। मंज़र भोपाली
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कहीं बेखयाल होकर!
अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं ‘तीन देवियां’ फिल्म के लिए मोहम्मद रफी जी का गाया हुआ गीत अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ – कहीं बेखयाल होकर, यूं ही छू लिया किसी ने! आशा है आपको यह पसंद आएगा,धन्यवाद । *****
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कौन कहां रहता है!
आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कथा लेखक और कवि श्री गंगा प्रसाद विमल जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ। विमल जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री गंगा प्रसाद विमल जी की यह कविता – कौन कहां रहता हैघर मुझमें रहता है या मैंघर मेंकौन कहां…
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गए थे शौक़ से हम!
गए थे शौक़ से हम भी ये दुनिया देखने को, मिला हम को हमारा ही तमाशा देखने को। मंज़र भोपाली