Category: Uncategorized
-
शहर को करके ग़ुलाम रख दिया!
जो भी मिला उसी का दिल हल्क़ा-ब-गोश-ए-यार था, उसने तो सारे शहर को करके ग़ुलाम रख दिया| अहमद फ़राज़
-
मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं!
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं, मैंने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया| अहमद फ़राज़
-
पाँव में सारा कलाम रख दिया!
उसने नज़र नज़र में ही ऐसे भले सुख़न कहे, मैंने तो उसके पाँव में सारा कलाम रख दिया| अहमद फ़राज़
-
मैंने भी जाम रख दिया!
शिद्दत-ए-तिश्नगी में भी ग़ैरत-ए-मय-कशी रही, उसने जो फेर ली नज़र मैंने भी जाम रख दिया| अहमद फ़राज़
-
दिल सर-ए-शाम रख दिया!
आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थी, मैंने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया| अहमद फ़राज़
-
मैं तुझसे प्रीत लगा बैठा!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की एक रचना, शेयर कर रहा हूँ| इनको हरियाणा के राज्यकवि का दर्जा प्रदान किया गया, बाकी रचना स्वयं अपना परिचय देती है|लीजिए, प्रस्तुत है श्री उदयभानु ‘हंस’ जी की यह रचना- तू चाहे चंचलता कह ले,तू चाहे दुर्बलता कह ले,दिल ने ज्यों ही…
-
हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है!
अब आया तीर चलाने का फ़न तो क्या आया, हमारे हाथ में ख़ाली कमान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
-
बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है!
ज़रा सी बात जो फैली तो दास्तान बनी, वो बात ख़त्म हुई दास्तान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
-
दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है!
वो ज़ख़्म भर गया अर्सा हुआ मगर अब तक, ज़रा सा दर्द ज़रा सा निशान बाक़ी है| जावेद अख़्तर
-
ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी!
हमारे ज़ेहन की बस्ती में आग ऐसी लगी, कि जो था ख़ाक हुआ इक दुकान बाक़ी है| जावेद अख़्तर