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मुलाक़ात की कोशिश नहीं की!
वो हमें भूल गया हो तो अजब क्या है ‘फ़राज़’, हम ने भी मेल-मुलाक़ात की कोशिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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अपने क़बीले की हिफ़ाज़त के लिए!
कट मरे अपने क़बीले की हिफ़ाज़त के लिए, मक़्तल-ए-शहर में ठहरे रहे जुम्बिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की!
ऐ मिरे अब्र-ए-करम देख ये वीराना-ए-जाँ, क्या किसी दश्त पे तू ने कभी बारिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की!
हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं, हमने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की| अहमद फ़राज़
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सुराही ने भी गर्दिश नहीं की!
इक तो हम को अदब आदाब ने प्यासा रक्खा, उस पे महफ़िल में सुराही ने भी गर्दिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की!
जिस क़दर उससे त’अल्लुक़ था चला जाता है, उसका क्या रंज हो जिसकी कभी ख़्वाहिश नहीं की| अहमद फ़राज़
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उसने भी पुर्सिश नहीं की!
अहल-ए-महफ़िल पे कब अहवाल खुला है अपना, मैं भी ख़ामोश रहा उसने भी पुर्सिश* नहीं की|*पूछताछ अहमद फ़राज़
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होंठों ने जुम्बिश नहीं की!
सामने उसके कभी उसकी सताइश* नहीं की, दिल ने चाहा भी अगर होंठों ने जुम्बिश नहीं की|*प्रशंसा अहमद फ़राज़
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मुसाफिर जाएगा कहाँ!
आज काफी दिनों बाद एक फिल्मी गीत शेयर करने का मन हो रहा है | ऐसे ही इस गीत की पंक्तियाँ दोहराते हुए खयाल आया कि फिल्म- गाइड के लिए लिखे इस गीत में शैलेन्द्र जी ने कितनी सरल भाषा में जीवन दर्शन पिरो दिया है- कहते हैं ज्ञानी, दुनिया है फ़ानी, पानी पे लिखी…