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दिल में रखता है न!
दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे,फिर भी इक शख़्स में क्या क्या नज़र आता है मुझे| शहरयार
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उस आख़िरी नज़र में !
उस आख़िरी नज़र में अजब दर्द था ‘मुनीर’,जाने का उस के रंज मुझे उम्र भर रहा| मुनीर नियाज़ी
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पांव हुए पत्थर के!
अपनी एक नई रचना आज आप सुधीजनों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ- कूदे हम खूब कभी कविता की रस्सी, अब तो लगता जैसे पाँव हुए पत्थर के| ऐसा कविता लेखन हुआ आपका श्रीमन, जैसे हो जंगल में मोर कोई नाचा| हर गूंगी हरकत जो यदा-कदा कर पाए किसने परखा उसको किसने है जांचा। भटके…
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यही दिल में डर रहा!
ख़ौफ़ आसमाँ के साथ था सर पर झुका हुआ, कोई है भी या नहीं है यही दिल में डर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दूरी का ये तिलिस्म!
गुज़री है क्या मज़े से ख़यालों में ज़िंदगी, दूरी का ये तिलिस्म बड़ा कारगर रहा| मुनीर नियाज़ी
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मेरी सदा हवा में!
मेरी सदा हवा में बहुत दूर तक गई,पर मैं बुला रहा था जिसे बे-ख़बर रहा| मुनीर नियाज़ी
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दिल जल रहा था!
दिल जल रहा था ग़म से मगर नग़्मा-गर रहा,जब तक रहा मैं साथ मिरे ये हुनर रहा| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए,दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी
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उस परी-जमाल की!
उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी,हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी