आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय तारादत्त निर्विरोध जी का यह गीत–

थक गया हर शब्द
अपनी यात्रा में,
आंकड़ों को जोड़ता दिन
दफ्तरों तक रह गया।
मन किसी अंधे कुएं में
खोजने को जल
कागज़ों में फिर गया दब,
कलम का सूरज
जला दिन भर
मगर है डूबने को अब।
एक क्षण कोई
प्रबोली सांझ के
कान में यह बात आकर
कह गया,
एक पूरा दिन,
दफ्तरों तक रह गया।
सुख नहीं लौटा
अभी तक काम से,
त्रासदी की देख गतिविधियां
बहुत चिढ़ है आदमी को
आदमी के नाम से।
एक उजली आस्था का भ्रम
फिर किसी दीवार जैसा ढह गया,
एक लंबी देह वाला दिन
दफ्तरों तक रह गया।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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