न हम क़तरा समझते हैं!

ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की,
न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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