तुम्हें क्यूँकर बताएँ !

तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं,
समझ लो साँस लेना ख़ुद-कुशी करना समझते हैं|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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