आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी गीतकार स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
किशन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह नवगीत–

नीम-तरू से फूल झरते हैं
तुम्हारा मन नहीँ छूते
बड़ा आश्चर्य है ।
रीझ, सुरभित हरित-वसना
घाटियों पर
व्यँग्य से हंसते हुए
परिपाटियों पर
इन्द्रधनु सजते-संवरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है ।
गहन काली रात
बरखा की झड़ी में
याद डूबी, नीन्द से
रूठी घड़ी में
दूर वशीँ-स्वर उभरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है ।
वृक्ष, पर्वत, नदी,
बादल, चाँद-तारे
दीप, जुगनू, देव-दुर्लभ
अश्रु खारे
गीत कितने रूप धरते हैं
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply