शब्दों की किरचें!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अश्वघोष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

अश्वघोष जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अश्वघोष जी की यह कविता–

मन में पड़े थे टूटे हुए शब्द
जब तक मैं उनको जोड़ता
चुभने लगीं शब्दों की किरचें

मुक्ति की छटपटाहट में
चिड़िया की तरह हाफँता मैं
सोचता रहा बचने की तरक़ीब
देता रहा दुहाई सम्बन्धों की
सहता रहा किरचों का वहशीपन

चाकू से भी तेज़
तकुए से भी अधिक नुकीली किरचें
बींधती रहीं मुझे अनहद तक

काश! मैंने न छुए होते टूटे हुए शब्द
तो वहीं पड़ी रहतीं किरचें
और अब तक तो उन पर
जम गई होती विस्मृतियों की धूल।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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3 responses to “शब्दों की किरचें!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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