बनवासी राम की तरह!

आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

गीत


पांवों से धूल झाड़कर,
पिछले अनुबंध फाड़कर
रोज जिए हम-
बनवासी राम की तरह।

छूने का सुख न दे सके-
रिश्तों के धुंधले एहसास,
पंछी को मिले नहीं पर-
उड़ने को सारा आकाश।

सच की किरचें उखाड़कर,
सपनों की चीरफाड़ कर,
टांक लिए भ्रम,
गीतों के दाम की तरह।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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2 responses to “बनवासी राम की तरह!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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