आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी का यह गीत–

मैं तो था लाचार,
प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?
देखा चारों ओर तुम्हारे
वरदानों की भीड़ खड़ी है
अभिशापित सुहाग की बिन्दी
विधि ने मेरे भाल जड़ी है।
पाप किया या पुण्य कमाया
इसका निर्णय कौन करेगा,
क्योंकि यहाँ की हर परिभाषा
लाखों बार बनी बिगड़ी है।
पाप-पुण्य के सिरजनहारो
मेरा दुर्लभ दान निहारो,
खाली हाथों रहकर जो कुछ
जिसे दिया भरपूर कर दिया।
मैं तो था लाचार,
प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?
दो दिन खेल गँवाया बचपन
रातों में काटी तरुणाई,
लिखी आँसुओं ने जो पाती
वह मुस्कानों तक पहुँचाई।
मैं दुर्बलताओं का बन्दी
पर मेरी हिम्मत तो देखो,
गीतों का परिधान पहनकर
सूली ऊपरसेज सजाई।
लोक लाज के पहरेदारो
आओ अपनी भूल सुधारो,
इतना पास नहीं पहुँचा था
जितना तुमने दूर करदिया।
मैं तो था लाचार,
प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?
पग धरने को ठौर नहीं है
धनी किसके द्वार रमाऊँ?
मेरी चलने की आदत है
कौन नगर की डगर न जाऊँ?
कहने को तो मीत बहुत हैं
किससे रुँठू किसे मनाऊँ?
किसकी सुन्दरता पर रीझूं
किसे असुन्दर कह ठुकराऊँ?
रूप-गगन के चाँद-सितारो
तुम मेरी आरती उतारो,
अपने अति-सुन्दर सपनों का
दर्पण चकनाचूर कर दिया।
मैं तो था लाचार,
प्यार ने तुमको क्यों मजबूर कर दिया?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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