ससुर जी उवाच!

आज मैं हिंदी के अत्यंत श्रेष्ठ हास्य-व्यंग्य कवि श्री अशोक चक्रधर जी की एक   रचना शेयर कर रहा हूँ।

चक्रधर जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता –

डरते झिझकते
सहमते सकुचाते
हम अपने होने वाले
ससुर जी के पास आए,
बहुत कुछ कहना चाहते थे
पर कुछ
बोल ही नहीं पाए।

वे धीरज बँधाते हुए बोले-
बोलो!
अरे, मुँह तो खोलो।


हमने कहा-
जी. . . जी
जी ऐसा है
वे बोले-
कैसा है?

हमने कहा-
जी. . .जी ह़म
हम आपकी लड़की का
हाथ माँगने आए हैं।

वे बोले
अच्छा!
हाथ माँगने आए हैं!
मुझे उम्मीद नहीं थी
कि तू ऐसा कहेगा,
अरे मूरख!
माँगना ही था
तो पूरी लड़की माँगता
सिर्फ़ हाथ का क्या करेगा?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

4 responses to “ससुर जी उवाच!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. हास्य और व्यंग्य का इतना सुंदर उदाहरण साझा करने के लिए शुक्रिया। ‘पूरी लड़की माँगता’ वाली पंक्ति ने निरुत्तर कर दिया! पढ़कर बहुत आनंद आया।

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    1. हार्दिक आभार जी

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