बेटियाँ!

आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि तथा मेरे लिए गुरु तुल्य रहे स्वर्गीय डॉक्टर कुंवर बेचैन जी की एक  रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुंवर बेचैन जी का यह गीत –

बेटियाँ-
शीतल हवाएँ हैं
जो पिता के घर बहुत दिन तक नहीं रहतीं
ये तरल जल की परातें हैं
लाज़ की उज़ली कनातें हैं
है पिता का घर हृदय-जैसा
ये हृदय की स्वच्छ बातें हैं


बेटियाँ –
पावन-ऋचाएँ हैं
बात जो दिल की, कभी खुलकर नहीं कहतीं
हैं चपलता तरल पारे की
और दृढता ध्रुव-सितारे की
कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन
नाव हैं ये उस किनारे की


बेटियाँ-
ऐसी घटाएँ हैं
जो छलकती हैं, नदी बनकर नहीं बहतीं

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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8 responses to “बेटियाँ!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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  2. यह एक अत्यंत संवेदनशील और कोमल कविता है जो बेटियों को एक नाज़ुक, प्रकाशमान और आवश्यक उपस्थिति के रूप में चित्रित करती है, फिर भी क्षणभंगुर भी। उपमाएँ सुंदर और सम्मानजनक हैं, जो प्रेम, गर्व और एक शांत उदासी को व्यक्त करती हैं। यह एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है जो बेटियों और कुंवर बेचैन जी की मानवीय और काव्य दृष्टि दोनों का सम्मान करती है।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी, आप बहुत गहराई से विवेचना करते हैं।

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  3. अद्भुत! कुंवर बेचैन जी की यह रचना सच में आँखें नम कर देती है। विशेषकर यह पंक्ति— ‘कुछ दिनों इस पार हैं लेकिन, नाव हैं ये उस किनारे की’— दिल की गहराइयों तक उतर गई। बेटियों के अस्तित्व को इतने सुंदर शब्दों में पिरोया गया है। इतनी अनमोल रचना साझा करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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  4. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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